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इजराइल बनाम भारत


आज हम इजराइल से घनिष्ठता बढ़ने की वजह से खुश एवं सुरक्षित महसूस कर रहे हैं। 


इजराइल जिसकी स्थापना 1948 में हुई और  जिसकी जनसंख्या एक करोड़ से भी कम है, वह सभी क्षेत्रों में प्रगति कर रहा है। हर क्षेत्र में तकनीकी विकास कर रहा है उसका विकास उधार ली हुई तकनीक के सहारे नहीं है। हम जो विकास करना चाह रहे हैं वह दुनिया भर के देशों से उधार ली गई तकनीक के सहारे करना चाह रहे हैं। विज्ञान एवं तकनीक के विकास में 130 करोड़ जनसंख्या होने के बावजूद, हम इन छोटे देशों की बराबरी करने में भी असमर्थ हैं।


मेरी इजराइल के बारे में यह भ्रमणा थी कि उस पर अमेरिकन एवं यूरोपियन संस्कृति हावी होगी। गत वर्ष मेरी इजरायल यात्रा के दौरान मेरी यह भ्रमणा दूर हो गई। सबसे महत्वपूर्ण बात जो मेरी समझ में आई, वह यह थी कि वहां के बच्चों को शिक्षा हिब्रू में दी जाती है। इजरायल में बच्चे घर हिब्रू बोलते हैं, अपनी मातृभाषा हिब्रू में ही सोचते हैं और हिब्रू में ही पढ़ते हैं। इसके विपरीत हमारे बच्चे घर पर हिंदी बोलते हैं, अपनी मातृभाषा हिंदी में सोचते हैं और अंग्रेजी पढ़ते हैं। शिक्षा और सोच की यह विषमता बच्चों के विज्ञान एवं तकनीकी विकास के आड़े आ जाती है। हमारे देश के विकास के लिए जो कारण है उनमें यह कारण मुख्य रहा है।


मैं यह नहीं कहता कि हमें अंग्रेजी नहीं पढ़नी चाहिए। अंग्रेजी को दूसरी भाषा पढ़ाया जाना चाहिए। मेरा कहने का यह तात्पर्य है कि हमारी शिक्षा का माध्यम बच्चे मातृभाषा में ही होना चाहिए। हिब्रू में शिक्षा के बावजूद इसराइल IT सॉफ्टवेयर के क्षेत्र हमसे बहुत आगे है। अंग्रेजी भाषा में पढ़ने के दबाव, हमारे 95% बच्चों के शैक्षणिक विकास में असमानता पैदा कर रही है। उससे जूझते और तालमेल बिठाते हुए 95% बच्चों की शिक्षा पूरी हो जाती । तकनीकी विकास की सोच उनको छू नहीं पाती है। ऐसा नहीं है कि हम भारतीयों में बुद्धि कमी है। अंग्रेजी के दबाव में हमारे 95% बच्चे अपनी बुद्धि को वैज्ञानिक अनुसंधान विकास में कार्यान्वित करने में विफल हो जाते हैं। फ्रांस , जर्मनी, जापान, कोरिया, रूस, चाइना एवं इजराइल ने अपनी तकनीकी विकास को मातृभाषा के सहारे ही आगे बढ़ाया है।


मैं यह मानता हूँ की अंग्रेजी की वजह से कुछ भारतीय बहुराष्ट्रीय कंपनियों सीईओ बनने में सफल हुए हैं लेकिन इसे सर्वांगीण विकास नहीं कहा जा सकता। अंग्रेजी सिर्फ चंद लोगों का विकास कर सकती है । इसी वजह से आज भारत उधार की तकनीक के सहारे विकास की गाड़ी आगे बढ़ाने के लिए मजबूर हैं। 133 करोड़ की जनसंख्या वाले देश का सर्वांगीण विकासराष्ट्रभाषा एवं राष्ट्रवाद के सहारे ही किया जा सकता है।


- मानकचंद राठोड़